प्रधानमन्त्री महोदय की सफल बाईपास सर्जरी से जुडा मुद्दा

प्रधानमन्त्री महोदय की सफल बाईपास सर्जरी हुई, हमारे प्रधानमन्त्री जल्द स्वस्थ होकर कार्य पर वापस लौटें, सारे राष्ट्र की यही मंगलकामना है. इस समय मुझे अपने एक पड़ोसी जो सेवानिवृत्त सिपाही हैं, के पिता की याद आ गयी. आप कहेंगे कि बात को कहां से उठाकर कहां रख दिया और इसके औचित्य पर भी प्रश्नचिन्ह लगा सकते हैं. लेकिन मेरी बात में दम है. मैं जिन की बात कर रहा था, वे सज्जन देश की सेवा कर सहायक उप-निरीक्षक के पद से सेवानिवृत्त हुये हैं और अब एक सिक्योरिटी कम्पनी में काम कर रहे हैं. इस समय लगभग पांच हजार रुपये किसी निजी सिक्योरिटी कम्पनी द्वारा उन्हें दिये जा रहे हैं. लगभग इतनी ही पेंशन पा रहे हैं, उनके घर में कुल छ: प्राणी हैं, दो स्वयं मियां-बीवी, तीन बच्चे और एक उनके पिता. उनके पिता के ह्रदय की आर्टरी ब्लाक हो गयीं, इलाज अब एक ही है, सर्जरी. निजी क्षेत्र के अस्पतालों में सर्जरी कराने की औकात नहीं है उनकी. जिला स्तर के सरकारी अस्पतालों में यह सुविधा है ही नहीं. निजी क्षेत्र के अस्पताल में इलाज करायेंगे तो सम्भवत: उन्हें अपना मकान तक बेच देन पड़ेगा. जायें तो कहां जायें. प्रधानमन्त्री महोदय ने यह सदेच्छा जाहिर की कि जैसा इलाज उन्हें मिला वैसा इलाज और वैसी सुख सुविधायें सभी को मिलें. लेकिन उनकी इस सदेच्छा को शायद ही कभी धरातल नसीब हो पायेगा. कारण पहला कि सरकारी अस्पतालों में आवश्यक बुनियादी इन्फ़्रास्ट्रक्चर नहीं है. दूसरा चिकित्सकों का अभाव, अधिकतर चिकित्सक वेतन और एनपीए सरकार से लेते हैं साथ ही निजी अस्पतालों में अपनी सेवायें मुहैया कराते हैं. तीसरा यह कि जिला मुख्यालय से चालीस किमी दूर जहां न बिजली है, न पानी है, न पहुंचने के लिये सड़क और न वाहन, उस अस्पताल में चिकित्सक कैसे जायेगा और क्यों जायेगा. चौथा कि जो ईमानदारी से काम करते हैं वह मुफलिसी में मर जाते हैं और कभी भी मुख्यालय में पोस्टिंग नहीं पा पाते और जो जोड़-तोड़ करते हैं वे हमेशा मुख्यालय में ही पोस्ट रहते हैं. पांचवा यह कि काम करने वाले के लिये कोई इन्सेन्टिव नहीं और न काम करने वाले और कोताही बरतने वाले के लिये कोई सजा नहीं. छटा यह कि अपोलो जैसा अस्पताल जिसने जमीन लेने के लिये दिल्ली में यह लिखकर दिया था कि कुछ प्रतिशत गरीबों का इलाज मुफ्त में करेगा आज अरबों कमाने के बाद यह कहता है कि जमीन का दाम ले लो और सरकार चुप रहती है.सातवां यह कि ड्रग कन्ट्रोल में लिस्ट होने के बाद कम्पनियां फार्मूला ही बदल डालती हैं, ऐसी मुनाफाखोर कम्पनियां आज भी गरीबों का लहू पी रही हैं और सरकारें चुपचाप इस भ्रष्टाचार में सहयोगी बनती हैं. आठवां यह कि अधिकांश चिकित्सक आज जेनेरिक नाम नहीं लिखते बल्कि उस कम्पनी का ब्रांड नेम आगे सरका देते हैं जो सबसे अधिक कमीशन देती है. नवां यह कि किसान के उत्पाद का दाम तो सरकार निर्धारित करती है लेकिन चिकित्सक का शुल्क, विभिन्न प्रकार के आपरेशनों की फीस, परीक्षणों की फीस, अस्पताल में भर्ती होने का शुल्क निर्धारित नहीं करती. दसवां यह कि देश में सस्थायें नियम-कानून से शासित नहीं होतीं व्यक्तियों से शासित होती हैं, इसलिये जो शासक जैसा चाहता है वैसा उसे चलाता है. ग्यारवां यह कि आम आदमी सिर्फ एक वोट मात्र है और उसकी औकात, उसकी कीमत एक वोट भर है (यकीन न हो तो लालू को सुन लें जिसमें वह अपने से मिलने आये लोगों को गरिया रहे हैं), वह आम आदमी जिसके लिये अभी सात दिन पहले संविधान में छपी उद्देशिका को अखबारों में छापा गया था और जिसकी घुट्टी आम आदमी को हर पांच साल में पिलाई जाती है. बारहवां यह कि आम आदमी के बीमार होने से अच्छा है मर जाना, मर जाता है तो एक ही मरता है, गंभीर रूप से बीमार पड़ जाता है तो पूरे परिवार को मार देता है.

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