क्या वे शहीद नहीं हैं जिनके शरीर पर वर्दी नहीं थी , पुलिस अधिकारी नशे के कारोबार में लिप्त

मुम्बई आतंकवादी हमलों के शहीदों के प्रति पूरा सम्मान रखते हुये मैं अपने आपको यह सवाल पूछने से रोक नहीं पा रहा हूं कि जिन पुलिस अधिकारियों की हत्या आतंकवादियों ने कर दी, उनके प्रति तो सरकार ने अपनी जिम्मेदारी निभाकर इतिश्री कर ली. लेकिन बिल्कुल इसी तर्ज पर मुम्बई में जिन आम लोगों के सीने आतंकवादियों ने छलनी कर दिये, उनके लिये सरकार ने क्या किया, उस किशोर को मरणोपरान्त कोई सम्मान क्यों नहीं दिया जा सका, जिसने नारीमन हाउस पर सुरक्षा बलों की अहम मदद की. जो तीन पुलिस अधिकारी एक साथ शहीद हुये (या कहा जाये जिनकी हत्या हुई) वह तो सम्मान के हकदार हैं, क्या मात्र इसलिये कि उनके शरीरों पर पुलिस की वर्दी थी, लेकिन जो वर्दी के बिना शहीद हुये, क्या वह किसी सम्मान के हकदार नहीं हैं?


कुछ दिनों पहले पंजाब पुलिस का एक अधिकारी ड्रग्स की तस्करी में लिप्त पाया गया और अब मुम्बई में एक आई०पी०एस० अधिकारी के यहां से सैंतीस किलो हेरोइन की बरामदी हुई है. इससे क्या मेरी इस बात को बल नहीं मिलता कि अगर पुलिस नाम की संस्था को खत्म कर दिया जाये तो सत्तर फीसदी अपराध स्वत: ही खत्म हो जायेंगे.कृपया मेरी पिछली पोस्ट देखें अफसर बना तस्कर.

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