कडुवे सच की एक और बानगी
जिन दिनों मुम्बई में हमला हुआ था उन दिनों मैं अपने एक मुस्लिम मित्र (आश्चर्य न करें) के बच्चे को देखने एक अस्पताल में गया जो एक मुस्लिम बहुल इलाके में था. वहां काम करने वाले लड़के इस बात को कहते हुये अत्यन्त गर्व महसूस कर रहे थे कि ताज, ओबेराय या नारीमन हाउस में दो-दो, तीन-तीन लड़ाकों (मुस्लिम युवाओं) ने कैसे कमांडों को नाकों चने चबा दिये और इतने दिनों तक मोर्चा लेते रहे. जाहिर है इस प्रकार की मानसिकता इस देश को कहां ले जा रही है, इस पर सभी को विशेष तौर पर मुस्लिमों को विचार करने और फिर इस मानसिकता को दूर करने की आवश्यकता होगी, अन्यथा वह दिन दूर नहीं कि भारत में भी अफगानी कबीलाई इलाकों की तरह लड़कियों को स्कूल न भेजने, पुरुषों को दाढ़ी रखने और न जाने क्या क्या तालिबानी हुक्म झेलने पड़ेंगे और यह भी हो सकता है कि यहां भी तालिबानी व्यवस्था लागू हो जाये.
यह एक अटल सत्य है कि मुस्लिम समाज में जो लोग इन कट्टरपंथियों से दूर रहना चाहते हैं उन्हें संख्याबल से दबा दिया जाता है.
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