हड़तालों से देश में अफरा-तफरी मच गयी

हड़तालों से देश में अफरा-तफरी मच गयी है। आश्चर्य तब होता है जब पेट्रोलियम कंपनियों के अधिकारी हड़ताल पर जाते हैं. मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ था जब यह पता चला कि पेट्रोलियम कंपनी के ताजा-ताजा भर्ती हुए जूनियर मैनेजमेंट अधिकारी का वेतन एक लाख रुपये प्रति माह के आसपास था. इनकी कम्पनियां घाटे में हों या मुनाफे में, इन्हें हर वर्ष लाखों में बोनस मिलता है. अगर केन्द्र या राज्य सरकारों के सी-डी क्लास के कर्मचारी जिनका वेतन अधिकतम दस-पन्द्रह हजार होता होगा, हड़ताल करें तब भी समझ में आता है, लेकिन लाखों रुपये प्रतिमाह पाने वाले हड़ताल करें, मेरी मोटी बुद्धि से परे है.

वकील भी हड़ताल पर हैं, वैसे भी भारतीय कानून और कानूनी प्रक्रिया को वकीलों का स्वर्ग कहा गया है। वकीलों को इससे कोई मतलब नहीं कि उनके मुवक्किलों को जल्द न्याय मिले. राम जेठमलानी के समय मुकदमों की समय-सीमा निर्धारित करने के लिये एक बिल लाने का प्रावधान किया जा रहा था, लेकिन वकीलों के सौभाग्य से वह बिल आ ही नहीं सका. वकीलों पर भी ए़स्मा लागू किया जाना चाहिये, इनकी जब इच्छा होती है हड़ताल पर चले जाते हैं, बिना यह सोचे कि एक मुवक्किल/एक गवाह जिसकी तारीख लगी थी, जो अपना पैसा खर्च कर रहा है, जो अपना बहुमूल्य समय दे रहा है न्याय पाने की आस में, उसके तमाम प्रयासों पर पानी फेर देते हैं ये काले कोट वाले.

ट्रक आपरेटर भी हड़ताल पर हैं, डीजल के दामों में कमी, टायरों के मूल्यों में कमी और पता नहीं किन मांगों को लेकर। जब कभी भी कोई कर बढ़ता है या पेट्रोल-डीजल के दामों में वृद्धि होती है, ट्रांसपोर्टर किराया-भाड़ा बढ़ा देते हैं, ये महानुभाव बतायेंगे कि जब पेट्रोल-डीजल के दामों में कमी होती है या मूल्य-वृद्धि वापस होती है तब कितनी बार और कितनी कमी की गयी किराये-भाड़े में.

कुछ और भी हड़ताले हो रही हैं पूरे देश में छटे वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने या फिर उसकी विसंगतियों को दूर करने को लेकर। निकम्मे और निर्णय लेने में अक्षम तथा जान-बूझ कर काम न करने वाले कर्मचारियों-अधिकारियों को निकाल बाहर किया जाये और काम करने वाले कर्मचारियों-अधिकारियों को अच्छा वेतन दिये जाने में कोई परेशानी नहीं होना चाहिये, लेकिन लगता नहीं ऐसा होगा क्योंकि जब सांसद-विधायक बिना कुछ किये धरे तमाम वेतन-भत्ते पाते रहते हैं तो सरकारी दामाद ही इससे महरूम क्यों रहें.

अन्त में मैं यह कहना चाहूंगा कि कभी ऐसा भी हो कि भूख हड़ताल पर चली जाये, गरीबी, बेरोजगारी, दुर्भिक्ष भी हड़ताल पर हों. किसी दिन दुर्घटनायें, मौत हड़ताल पर चली जायें. अपराधी हड़ताल पर हों. मिलावट करने वाले, घोटालेबाज, चोर, लुटेरे, हत्यारे, तस्कर, भ्रष्टाचारी भी तो हड़ताल पर रहें. और वह दिन भी तो कभी आये जिस दिन कुटिल नेताओं की बुद्धि हड़ताल पर रहे.

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