कम से कम कोई तो अच्छा काम किया मायावती ने

दिबियापुर, औरेया के थानाध्यक्ष होशियार सिंह को बर्खास्त कर कम से कम एक तो अच्छा काम किया मायावती सरकार ने. कानून व्यवस्था को बनाये रखने का पूरा दायित्व पुलिस प्रशासन का होता है, और यदि पुलिस ठीक से काम करने लगे तो आधे से ज्यादा अपराध तो अपने आप कम हो जायेंगे. होशियार सिंह एक चैनल पर आकर खुद को पाक-साफ बता रहे थे (जनाब को खबर थी कि शेखर तिवारी मनोज गुप्ता को उठाकर ले गया है, मनोज गुप्ता की पत्नी की शिकायत पर जब थाने से दरोगा आया तो थोड़ी देर बाद ही उसकी बात होशियार सिंह से हुई और वह वापस चला गया) और बड़े अधिकारियों तथा और पुलिस वालों की भी पोल खोल रहे थे कि चन्दा इकठ्ठा किया जा रहा था और फफूंद के थानाध्यक्ष के पास जमा किया गया था. भारत में हर कोई जानता है कि थाने में पोस्टिंग कैसे होती है और पैसा नीचे से ऊपर तक कैसे जाता है और जो एक बार थानेदार पा गया उसकी वित्तीय स्थिति कितनी मजबूत हो जाती है. जो पकड़ गया वो चोर बाकी सब साहूकार. एक सवाल यदि होशियार सिंह और शेखर तिवारी ने किसी आम आदमी को मार दिया होता तो क्या शेखर तिवारी गिरफ्तार होता और थानेदार बर्खास्त होता. दूसरा सवाल यदि चैनल को होशियार सिंह मिल सकता है तो पूरे उत्तर प्रदेश की पुलिस उसे क्यों नहीं पकड़ सकी! कविता चौधरी का मामला याद है, उसका मुख्य आरोपी रविन्द्र प्रधान जेल में ही मर गया!

दूसरा अच्छा काम जो मुझे लगा वह था दिसम्बर, २००८ में सहारा समूह द्वारा मुम्बई के शहीदों के परिवारों को उनके बच्चों के व्यस्क होने / स्वत: आर्थिक रूप से स्वतन्त्र होने तक हर माह दी जाने वाली एक निश्चित राशि (सम्भवत: यह शहीदों के वेतन के बराबर है). और भी अच्छा लगता यदि अन्य बड़े आर्थिक घराने भी शहीद हुये आम जनों के लिये भी कुछ व्यवस्था करते, क्योंकि जो व्यक्ति किसी सेवा में नहीं होंगे, उनके परिवारियों को तो पेंशन भी नसीब नहीं होगी.

एक अन्य खबर देखी दिल्ली विकास प्राधिकरण के फ्लैटों में सम्भावित घोटाले की. यह कोई दिल्ली विकास प्राधिकरण का ही अनोखा मामला नहीं है, न जाने कितने भूमि आबंटन घोटाले हो चुके हैं इस देश में जिनमें बड़े लोग शामिल होते हैं, उदाहरण के लिये लखनऊ और नोयडा. हर विकास प्राधिकरण में न जाने कितने फर्जी नामों से पंजीकरण कराये जाते हैं और बाद में इनका आबंटन निरस्त कर दूसरों से हजारों-लाखों रुपये लेकर आबंटन कर दिया जाता है. आज किसी को याद भी नहीं होगा कि लखनऊ और नोयडा में घोटाले हुये भी थे और इन घोटालों के आरोपियों के विरुद्ध क्या कार्रवाई हुई. यदि घोटालों को उजागर करने वाले खबरिया चैनल इनका फीडबैक भी देते रहें तो यह आम आदमी के हित में होगा.

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