एक अस्पताल में दिखाई देती है पूरे भारत की छवि

अभी भाई अनिल जी का एक लेख पढ़ा था जो दवाईयों के अनाप-शनाप मूल्यों के ऊपर था. हमारे एक मित्र हैं जो अक्सर मजाकिया परिभाषायें बताते रहते हैं. उन्होंने अंग्रेजी शब्द कस्टमर की परिभाषा दी है-वह व्यक्ति जो कष्ट से मरे, कन्ज्यूमर-वह व्यक्ति जो किसी पदार्थ को कन्ज्यूम कर मरे. उनकी इन परिभाषाओं को लेकर पहले मैं हंसता रहता था, लेकिन अब मुझे समझ में आने लगा है कि उनके द्वारा बताई गयी परिभाषायें कम से कम भारतीय परिप्रेक्ष्य में बिल्कुल ठीक हैं. सबसे पहले बात कर ली जाये दवाईयों की, ओवर द काउन्टर मिलने वाला कफ सीरप 45 से 50 रुपये के बीच आता है जिस पर कम से कम आठ से बारह रुपये विक्रेता को मिलते हैं. पित्ती की एक दवाई सेट्रिजीन अलग-अलग ब्रांड नाम से पांच रुपये से लेकर पैंतालीस रुपये में दस तक मिलती हैं. यह बात तमाम दवाईयों पर लागू होती है, अलग-अलग ब्रांड नाम से बिकने वाली एक जेनेरिक दवाई में दस गुना फर्क तक मिलता है. कहा जा सकता है कि पांच रुपये वाली सेट्रिजीन सब-क्वालिटी प्रोडक्ट हो सकती है, यदि ऐसा है तो ड्रग इंस्पेक्टरों के लिये सरकारें क्यों पालती हैं? कम से कम चार ऐसे चिकित्सकों को मैं जानता हूं जिनके लिये दवा कम्पनी ने आठ-दस लाख रुपये की गाड़ी भेंट की, मात्र इसलिये कि उसकी दवाईयां आने वाले दो सालों तक उन चिकित्सकों के द्वारा लिखी जायेंगी. सामान्यत: एम०आर०आई कराने का शुल्क साढ़े चार-पांच हजार आता है लेकिन अगर चिकित्सक अपना कट छोड़ देता है तो यही शुल्क लगभग तीन हजार पहुंच जाता है. बड़े-बड़े दावे करने वाली आई एम ए को यह सब दिखाई नहीं देता, कितने ऐसे चिकित्सक हैं जो दवाईयों के जेनेरिक नाम लिखते हैं, कुछ एक को छोड़ दें तो बाकी सभी ब्रांड नाम लिखकर दवा कम्पनियों की भेंट चढ़वा देते हैं आम आदमी की खून पसीने की कमाई। अपने ही अस्पताल में चिकित्सक मरीज को देखने का विजिटिंग चार्ज लेता है गोया कि मरीज उनके हास्पिटल में हनीमून मनाने आया हो. नर्सिंग चार्जेज अलग, इंजेक्शन/इन्ट्रावीनस ड्रिप देने के चार्जेज अलग, विजिटिंग चार्जेज अलग और पता नहीं कौन कौन से चार्जेज ले लिये जाते हैं, पता भी नहीं चलता (लेकिन नर्सों और वार्ड व्यायज का खूब शोषण किया जाता है, लाखों रुपये महीने कमाने वाले यह लोग नर्स और वार्ड व्यायज को ढाई से अधिकतम चार हजार रुपये प्रतिमाह देते हैं). हमारे यहां एक चिकित्सक ने अपने एजेंट तीस प्रतिशत कमीशन पर नियुक्त कर रखे हैं. पूरे मंडल में कहीं भी दुर्घटना हो, बाकी सारे अस्पताल छोड़ कर उनके यहां मरीज लाये जाते हैं, कई बार इसके लिये दूसरे अस्पतालों में जाकर उनके एजेंटों ने मार-पीट भी की, लेकिन उन्होंने पुलिस वाले भी सैट कर रखे हैं (सैट से अच्छा शब्द मुझे नहीं मिला), इसलिये उनके एजेंटों के खिलाफ आजतक कोई कार्रवाई नहीं हुई,यह सब भी छोड़िए , पुलिसवाले भी दुर्घटनाओं के शिकार लोगों को लेकर वहीं पहुंचाते हैं। इनके यहां एक बार सांप काटे एक मरीज की मौत होने के बाद दो-तीन दिनों तक वेन्टीलेटर पर लिटाये रखा गया, बाद में काफी हंगामा होने पर उसे निकाला गया। यहां विकास प्राधिकरण का एक खेल भी बताता हूं, जब इनके अस्पताल का नक्शा पास हुआ तो उसमें पार्किंग के लिये बेसमेन्ट का निर्धारण किया गया था, नक्शा पास करने के लिये पार्किंग का होना अनिवार्य होता है, जिस समय अस्पताल बन रहा था उस समय बेसमेन्ट के सामने बड़ा सा बोर्ड लगा रखा था "पार्किंग". बाद में पार्किंग होने लगी अस्पताल के आगे खाली पड़ी नगर निगम की जगह पर, जिसमें एक बार मोटरसाइकिल खड़े करने पर दस रुपये लिये जाने लगे जो जाते हैं सीधे अस्पताल के मालिक की जेब में. बड़े वाहन खड़े होते हैं सड़क पर जो राष्ट्रीय राजमार्ग अवरुद्ध करने में अपना पूरा योगदान देते हैं. इस अस्पताल के बनते समय इसके बाहर एक बहुत बड़ा बरगद का पेड़ लगा था, जिसे बिना किसी अनुमति के काटना प्रारम्भ कर दिया गया, एक विख्यात हिन्दी पत्र के फोटोग्राफर आये, अगले दिन अखबार में पेड़ काटने के बारे में छपा, फिर डी०एफ०ओ० ने भी कड़ी कार्रवाई करने का बयान दिया. एक सप्ताह के अन्दर पेड़ का पता भी नहीं चला, दोबारा अखबार में भी नहीं छपा, न डी०एफ०ओ० का कोई बयान आया. इनके यहां आयकर वालों का भी छापा पडा, सत्तर लाख रुपये दे दिये गये. न नगर निगम को यह दिखाई देता है कि उसकी जगह में अस्पताल पार्किंग चला रहा है, न विकास प्राधिकरण को यह दिखाई देता है कि नक्शा पास करते समय जो पार्किंग प्लेस था वह अस्पताल बनने के बाद कहां गायब हो गया. न अखबार को बरगद का वह पेड़ दिखाई दिया जिसका फोटो उनके अखबार में छपा था, डी०एफ०ओ० साहब को भी वह बरगद दिखाई देना बन्द हो गया जिसके काटने पर कड़ी कार्रवाई करने का बयान दिया था. अस्पताल के सामने राष्ट्रीय राजमार्ग पर खड़े वाहन न तो जिला-अधिकारी, न आयुक्त, न पुलिस अधीक्षक, न आई०जी०-डी०आई०जी और न किसी संतरी-मंत्री-विधायक को दिखाई देते हैं. डाक्टर साहब बड़े होशियार हैं, एक-दो संस्थाओं को आर्थिक सहयोग दे दिया और फिर धीरे से अपना सम्मान भी करा लिया, सुना है किसी सर्व जन हिताय पार्टी से अपनी जाति के आधार पर जुड़ने जा रहे हैं और शायद सांसदी का टिकट भी पक्का हो गया है. हो सकता है सांसद बन भी जायें. मरीजों के बेबस तीमारदार अपना घर-मकान-खेत बेचकर-गिरवी रखकर उनके जीवन बचाने की आस में सबकुछ अर्पण करते रहते हैं और कस्टमर/कन्ज्यूमर की परिभाषा को सच्चा साबित करते रहते हैं. मुझे पूरा भारत, भारत के लोक-सेवकों की कार्यप्रणाली की छवि दिखाई देती रहती है इस अस्पताल में.

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