मुस्लिम नेताओं का व्यवहार, साम्प्रदायिकता तथा भारतीय संविधान
ए० आर० अंतुले कह रहे हैं कि वह अल्लाह के सिवा किसी और से नहीं डरते, अच्छी बात है, इसलिये उन्हें करकरे के मुद्दे पर बोलने से कोई नहीं रोक सकता. यह भी बिलकुल ठीक है, भारतीय लोकतन्त्र में अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की गारंटी दी हुई है. अन्तुले का यह भी कहना है कि उनके बयानों का दुरुपयोग पाकिस्तान में किया जा रहा है, लेकिन इसके बावजूद वह करकरे के सम्बन्ध में अपने बयानों पर कायम रहेंगे. खास बात यह कि अन्तुले जो बातें कर रहे हैं वही पूरे भारत के मुसलमान कर रहे हैं, यह बात दीगर है कि यह बातें ऊपर से नीचे लाई जा रही हैं अथवा नीचे से ऊपर लाई जा रही हैं. यहां पर प्रश्न यह उठता है कि अब ऐसा तो नहीं कि जो आतंकवादी मारे गये हैं, ये नेता उनकी राष्ट्रीयता भारत ही न घोषित कर दें और उन्हें हिन्दू न बता दें. जो बात सबको साफ साफ दिखाई दे रही है उस पर उंगली उठाने के पीछे क्या मकसद है? यदि यहां के मुसलमान नेता यह मान रहे हैं कि करकरे के मारे जाने में हिन्दुओं का हाथ हो सकता है तो यह अन्दाजा आसानी से लगाया जा सकता है कि उनकी सोच किस हद तक विकृत हो चुकी है. इन लोगों को जबाव देना चाहिये कि क्या करकरे एक भारतीय पुलिस अधिकारी न होकर एन्टी-हिन्दू अधिकारी थे? और अब करकरे के बाद जो कोई भी साध्वी के मामले की जांच करेगा उसे मार दिया जायेगा? क्या अब जांच भी हिन्दू और मुसलमान में बांट कर दी और की जानी चाहिये? आखिर क्या कारण है कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक तमाम मुस्लिम नेताओं और धर्मगुरुओं के सुरों में समानता है. जो लोग अभी तक यह गाते हुये नहीं थकते थे कि आतंकवादियों का कोई मजहब नहीं होता उनके मुंह से अब आवाजें निकलना क्यों बन्द हो गयीं. न जाने कितने अधिकारी जो कि मुस्लिम आतंकवादियों का मुकाबला करते हुये और उनकी जांच करते हुये मारे गये, उनके बारे में इन लोगों ने कभी कोई आवाज क्यों नहीं उठाई? क्या यह नहीं हो सकता कि वे मुस्लिम आतंकवादियों की जांच कर रहे थे इसलिये मारे गये? एक मामले में हिन्दू का नाम सामने क्या आया कि पूरे के पूरे हिन्दुओं को निशाना बनाना प्रारम्भ कर दिया गया जबकि हजारों की संख्या में मुस्लिम आतंकवादी पकड़े गये उस समय सबने यही कहा कि आतंकवादियों का कोई मजहब नहीं होता, लेकिन मजहब के दायरे से आतंकवादियों को बाहर नहीं किया गया। इसके बाद गौर कीजिये कांग्रेस के व्यवहार पर, पार्टी अध्यक्ष के विरुद्ध बोलने वालों को चाहे वह सही मुद्दे पर बोलकर आवाज क्यों न उठा रहे हों, निकाल बाहर कर दिया जाता है लेकिन अन्तुले को क्यों बाहर का रास्ता नहीं दिखाया जाता क्योंकि कांग्रेस भी वोटों की राजनीति में साम्प्रदायिकता को बढ़ावा दे रही है. क्या इससे यह भी सिद्ध नहीं होता कि कांग्रेस यह मानती है कि अन्तुले को इस मुद्दे पर निकालने से उसका मुस्लिम वोट-बैंक टूट जायेगा, इसलिये अन्तुले के खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई नहीं की गयी. कल को अगर मुसलमान कहने लगें कि जिन जिलों, मुहल्लों और प्रदेशों में उनकी आबादी बाकियों से अधिक हो गयी है, उनमें भारतीय कानून की जगह शरीयत लागू होगी तो उनकी यह मांग भी पूरी करनी पड़ेगी , और इसके लिये भी कुतर्क गढ लिये जायेंगे. अगर अल्लाह की बात करो, मजारों पर जाओ, मुसलमानों के लिये कमीशन बनाओ, उन्हें आरक्षण दो, हज यात्राओं के लिये सब्सिडी दो, बड़े शहरों में हज हाउस बनाओ तो धर्मनिरपेक्ष. हिन्दुओं के लिये मन्दिर की बात करो, भगवान की बात करो, अमरनाथ यात्रा के लिये जमीन देने की बात हो तो साम्प्रदायिकता. आश्चर्य तो तब होता है जब घनघोर साम्प्रदायिक राजनीति करने वाले दल दूसरों को साम्प्रदायिक बताते हैं, इस तथ्य से कौन इनकार कर सकता है कि टिकट देते समय प्रत्याशियों को उनके क्षेत्र में उनकी जाति और धर्म के मतदाताओं की संख्या को ही आधार बनाया जाता है। यहां पर कहने का उद्देश्य यह है कि सभी धर्मों से समान दूरी क्यों नहीं अपनाई जाती, सब धर्मों को सरकार की ओर से कोई न कोई दरअसल बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर तथा अन्य महापुरुषों ने जब संविधान में धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा समाहित की थी तो उनके संग्यान में यह नहीं था कि आगे जाकर कांग्रेस सभी धर्मों से समान दूरी न अपनाकर धर्मों को राजनीति से जोड देगी विशेषत: इस्लाम को विशेष प्रश्रय देगी. उनके संज्ञान में यह नहीं था कि आगे चलकर जनसांख्यिकीय संतुलन इतना बदल जायेगा कि मुस्लिम मात्र अपने ही वोटों से प्रत्याशियों की हार-जीत तय करेंगे. उनके संज्ञान में यह भी नहीं था कि जैसे जैसे दुनिया में लोकतन्त्र मजबूत होते जायेंगे वैसे वैसे इस्लामी आतंकवादियों का वर्चस्व बढता जायेगा और इस्लाम पर कट्टरपंथियों की पकड़ मजबूत होती जायेगी. जिन लोगों ने महात्मा गांधी का साहित्य पढ़ा होगा वे जानते होंगे कि महात्मा ने लिखा था कि हिन्दू वे कार्य न करें जिससे मुसलमान भाइयों को कोई तकलीफ हो और मुसलमान वे कार्य न करें जिससे हिन्दुओं को कोई तकलीफ हो. लेकिन अब यह कोई ढकी छुपी बात नहीं कि अधिकतर साम्प्रदायिक दंगों की शुरुआत तब होती है जब हिन्दुओं को जानबूझकर कुरेदा जाता है. उसपर भी यह कि जबरा मारे भी और रोने न दे. आखिर धर्म-निरपेक्ष शासन का मतलब क्या है सभी धर्मों से समान दूरी न कि सभी मजहबों को प्रश्रय और तकलीफ वहीं से बढीं जहां से मजहब का इस्तेमाल वोट पाने के लिये प्रारम्भ कर दिया गया. अभी अधिक दिन नहीं हुये हैं जब शाही इमाम कांग्रेस को वोट देने का फरमान जारी करते थे. वैसे यह बात भी स्पष्ट है कि आम आदमी कितना भी चिल्ला ले नेताओं के कानों प जूं रेगने वाली नहीं, जिन लोगों के पास निजाम बदल देने की ताकत है, उनके लिये न तो शिक्षित किया गया और न ही कोई और औजार दिया गया कि वे एक बार चुनने के बाद इन्हें वापस बुला पाते. लोकतन्त्र के लिये जिन खूबियों को चुनकर रखा गया था उसका खुल्लम-खुल्ला दुरुपयोग किया गया. क्या कभी संविधान निर्माताओं ने कल्पना की थी कि लोकतन्त्र में राजतिलक होने लगेंगे, सांसद का पुत्र होना ही सांसद बनने के लिये पर्याप्त होगा. मुख्यमन्त्री की पत्नी होना मुख्यमन्त्री बनने के लिये एकमात्र योग्यता होगी. वैयक्तिक गुणों की जगह व्यक्ति पूजा होने लगेगी, दलों में आन्तरिक लोकतन्त्र की जगह पार्टी मुखिया की व्यक्तिगत पसंद मायने रखेगी. उन्होंने तो यह भी नहीं सोचा था कि डाकू-घोटालेबाज संसद में पहुंच जायेंगे, दर-असल उन्होंने एक ऐसे लोकतन्त्र की कल्पना की थी जो वास्तविक अर्थों में लोकतन्त्र था लेकिन इन कपटी नेताओं ने इस सुन्दर धर्म-निरपेक्ष लोकतन्त्र की हत्या कर उसकी जगह एक छद्म आवरण पहनाकर तानाशाही को बैठा दिया. और हम लोग जो पाकिस्तान के लिये खतरा मानते हैं,उनके लिये मैं कहना चाहूँगा कि हमारे लिये पाकिस्तान से उतना खतरा नहीं है, पाकिस्तान से ज्यादा खतरनाक तो हमारे देश के वह नेता हैं जो अपने फायदे के लिए संविधान की मूल भावना को ताक पर रखकर देश को बांटने का काम कर रहे हैं.
Comments
Post a Comment