आखिर वही हुआ जिसकी आशंका थी

आखिर वही हुआ जिसकी आशंका थी, नोट फार वोट कांड में सभी आरोपियों को क्लीन चिट दे दी गयी. सुधीन्द्र कुलकर्णी जिन्होंने सांसदों की खरीद-फरोख्त खोलने के लिये (राजनीतिक लाभ हेतु ही सही) स्टिंग आपरेशन की भूमिका बांधी थी, उनकी, अमर सिंह के भूतपूर्व कर्मचारी संजीव सक्सेना तथा सुहेल की जांच किसी अन्य एजेंसी द्वारा करवाने की अनुशंसा कर दी गयी. सपा के प्रो०रामगोपाल यादव ने संजीव सक्सेना को भी बरी करने की मांग की. अमर सिंह, अहमद पटेल तथा रेवती रमण सिंह को पूरी तरह से बख्श दिया गया. जब देश की सबसे बडी पंचायत में वोटों की खरीद-फरोख्त हो सकती है और पूरे मामले को खोलने की जगह उस पर लीपा-पोती कर दी जाती है तो आसानी से समझा जा सकता है कि इस देश में न्याय किसे मिलता है और कैसे मिलता है. कांग्रेस भी राजनीति में शुचिता लाने का हो-हल्ला पीटने में तो सबसे आगे रहती है लेकिन कथनी और करनी में अन्तर इस वाकये से स्पष्ट देखा जा सकता है. पता नहीं क्या जरूरत है चुनाव आयोग को आचार संहिता लागू कराने की, आम चुनावों में वोट के बदले दारू-नोट-धोती-जाति-धर्म बांटने वाले प्रत्याशियों के विरुद्ध कार्रवाई करने की. अगर सांसद वोट बेच सकते हैं तो आम जनता को वोट बेचने की इजाजत क्यों नहीं दी जाती. मैं पहले भी लिख चुका हूं कि इस देश में भ्रष्टाचार के विरुद्ध कोई कार्रवाई की ही नहीं जा सकती. नेता-व्यापारी-अधिकारियों ने मिलाकर इस देश को भ्रष्टाचार के कैंसर का रोगी बना दिया है जिसका एकमात्र इलाज आपरेशन है. यह लोग भ्रष्टाचार के विरुद्ध कार्रवाई करने के लिये कितने प्रयत्नशील हैं इस तथ्य से ही अन्दाजा लगाया जा सकता है कि स्विस बैंकों में डेढ हजार अरब डालर से अधिक का कालाधन जमा होने के बावजूद न तो इसके बारे में देश की संसद में कोई चर्चा हुई, न ही किसी नेता ने इस विषय पर कोई बयान दिया और न ही किसी खबरिया चैनल पर इस विषय को लेकर कोई खबर दिखाई गयी. सबसे अधिक संदिग्ध भूमिका इन खबरिया चैनलों की है जो चन्द्रमोहन और फिजा के किस्से तो चटकारे लेकर घन्टों सुनाते रहते हैं उन्हें नायक बनाने में कोई कसर नहीं छोडते लेकिन इस विषय पर दो-तीन मिनट की बाइट भी नहीं दे सकते. यही हाल हमारे यहां के समाजसेवियों और एन०जी०ओ० का है, तिस्ता जी, जावेद जी-शबाना जी, अरुंधति जी वगैरा न जाने कितने लोग हैं जो इस विषय पर कोई बात करने को तैयार नहीं, क्या भ्रष्टाचार अब कोई मुद्दा रह ही नहीं गया है या फिर यह इतना अधिक व्याप्त हो गया है कि अब इसे खत्म करने का मतलब पूरी व्यवस्था को ही आमूल-चूल परिवर्तित करना है जिसे करने के लिये कोई तैयार नहीं, या फिर समर्थ लोगों के काम अपने सम्बन्धों के बल पर यूंही हो जाते हैं और जहां कहीं उन्हें एक रुपया भ्रष्टाचार में खर्च करना पडता है वहां उससे वह सौ कमाते हैं. रही बात आम आदमी की तो उसका महत्व सिर्फ वोट देने तक है, सिर्फ एक दिन के लिये. एक किस्सा याद आ रहा है पता नहीं सत्य है या सिर्फ किस्सा भर लेकिन रोचक अवश्य है. रूस में रेल चलना प्रारम्भ हुई तो काफी अधिक संख्या में लोग बेटिकट चलने लगे. सरकार की तरफ से काफी प्रयास किये गये बेटिकट यात्रा रोकने के लिये, लेकिन कोई असर नहीं हुआ. थक-हार कर एक मन्त्री ने एक प्रस्ताव रखा जो स्वीकार करना बडा कठिन था लेकिन अन्ततोगत्वा उसे मान लिया गया, इस प्रस्ताव में यह निहित था कि हर माह एक बेटिकट यात्री को फांसी दी जाना थी. कार्ययोजना पर अमल प्रारम्भ हुआ रेलों में सख्ती कर दी गयी और हर माह ऐसे लोग छांटे गये जो सबसे अधिक बेटिकट यात्रायें करते थे. उनका नाम हर स्टेशन पर उद्घोषित किया जाने लगा कि फलां-फलां यात्री ने इस माह इतनी बेटिकट यात्रायें की हैं जिससे इतना नुकसान हुआ है और इस यात्री को अमुक जगह, अमुक समय पर फांसी दे दी जायेगी. और एक साल के अन्दर अन्दर बेटिकट यात्रा होना समाप्त हो गया. कहने का मतलब यह है कि यदि सरकार चाहे तो भ्रष्टाचार पूरी तरह से समाप्त किया जा सकता है, लेकिन सवाल घूम-फिर कर वापस वहीं आ जाता है कि अगर सांसदों की खरीद-फरोख्त हो सकती है और उस पर लीपा-पोती की जा सकती है तो फिर इस देश से भ्रष्टाचार कैसे खत्म किया जा सकता है. कहने के लिये कोई भी राजनीतिक दल कुछ भी कह सकता है लेकिन एक बात तो बिल्कुल साफ है कि सरकारी नौकर (वह भी नीचे दर्जे का) तो इसके लिये सजा पा सकता है लेकिन बडे स्तर पर भ्रष्टाचार करने वाले हमेशा मौज करते हैं. चारा कांड सामने है जहां एक-दो बडे अधिकारी और अनेक सरकारी कर्मचारी तो सजा पा गये लेकिन इस कांड के सिरमौर, जनक आज भी ऐश कर रहे हैं. तात्पर्य यह कि देश में दो तरह के लोग हैं, एक वे जो बेवकूफ बनाते हैं दूसरे वे जो बनते हैं, तय आपको करना है कि रेखा के किस तरफ खडा होना है. इस ओर खडे होइये शोषण कराइये, सरकार को, व्यवस्था को कोसते रहिये, दूसरी ओर चले जाइये, तेल पीजिये, चारा खाइये, अपने fellow countrymen का खून पीजिये और अपना खून बढाइये.
चलते चलते - भारत सरकार ने एक केन्द्रीय एजेंसी बनाने के लिये विधेयक पेश कर दिया, थोडा - बहुत संशोधन भी कानून में किया गया लेकिन जो रवैया दिखाई दे रहा है वह बता रहा है कि सरकार आतंकवादियों से निपटने के लिये अभी भी गंभीर नहीं है। बेहतर हो कि एक अन-डेटेड चेक तथा एक श्रद्धांजलि पत्र हर घर में दे दिया जाये.

१६ दिसम्बर रात में IBN-7 का संवाददाता चिल्ला रहा था कि यह देखिये वे हिन्दू आई-कार्ड जो आतंकवादियों ने बनवाये थे, धन्य है वह संवाददाता और इस चैनल के एडिटर। मेरी बुद्धि के कपाट खोल दिये उस विद्वान रिपोर्टर ने, पता चल गया कि हिन्दू और मुसलमान वगैरा आई-कार्ड भी बनते हैं देश में.

SSB के कमांडेंट ने एक सरकारी गवाह पश्चिमी चम्पारण के युवक गौरव वर्मा को इसलिये पीट-पीट कर मार डाला कि वह उनके विरुद्ध सरकारी गवाह था. मैं पहले भी लिख चुका हूं कि इस देश में जो सुलूक गवाहों के साथ किया जाता है उसे देखते हुये न्याय देने का ढोंग किया जा सकता है न्याय दिया नहीं जा सकता. अजय कटारा खुशकिस्मत है जो अब तक सिर्फ कई बार गिरफ्तार ही हुआ है लेकिन जिन्दा है. अगर कोई व्यक्ति खून का बदला लेने के लिये खून कर देता है तो यही पुलिसिये, यही न्याय के रखवाले उसे फांसी के फन्दे तक पहुंचा देते हैं, उसे फांसी का ही हकदार माना जाता है, लेकिन अगर कोई रसूखदार व्यक्ति, कोई पुलिस वाला हत्या कर देता है तो कुछ नहीं होता. पेशेवर कातिल तो मुजरिम है लेकिन वर्दी वाले जो पेशेवर कातिल का काम करते हैं, मौज करते हैं. अगर आप हत्या को अपने पेशे के रूप में अपनाना चाहते हैं तो वर्दी धारण कीजिये, फिर खुलेआम हत्यायें कीजिये और मौज कीजिये, हजारों-लाखों हत्यायें की हैं पुलिस वालों ने जिनमें मुकदमे भी दर्ज हुये हैं लेकिन कितने पुलिस वालों को फांसी हुई है? इस घटना के बाद भी क्या होगा, वही निलम्बन की कार्रवाई, मुकदमा दर्ज करने की खानापूरी. नतीजा होगा शून्य. उस कमांडेंट के विरुद्ध गवाही देकर किसे अपनी जान गंवानी है, क्या उसके अधीनस्थ या उसके सहयोगी गवाही देंगे, उत्तर है नहीं. जांच कौन करेगा कोई ऐसी ही एजेंसी, जो अपने बिरादरी भाई के विरुद्ध क्योंकर जाने लगी. जो व्यक्ति जांच करेंगे वह साथ के होंगे, जूनियर या सीनियर होंगे. या फिर कैसी ही जान-पहचान-रिश्तेदारी निकाल ली जायेगी अन्यथा पैसा तो है ही. मामला यदि अदालत में पहुंच भी गया तो सफेद को स्याह बनाने वालों की कोई कमी नहीं.

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