कुछ कुतर्क और कुछ प्रश्न
शकील साहब और अन्य नेता कहते थे कि पोटा के रहते हुए संसद पर आक्रमण हुआ तो पोटा ने क्या कर लिया। अब बाकी कानूनों के रहते आक्रमण हुआ है तो क्या अब सारे क़ानून ख़तम कर दिए जायेंगे। पुलिस और सेना के रहते हमला हुआ है तो क्या पुलिस और सेना ख़त्म कर दी जायेगी और तो और सुरक्षा की जिम्मेदारी लेने वाले नेताओं के रहते हमला हुआ है तो अब क्या नेता समुद्र में छलाँग लगा देंगे।
देवबंद के उलेमाओं ने यह कहा है कि आतंकवादियों के साथ कठोर सुलूक करना चाहिए, साथ में यह भी जोड़ा कि यह कहीं मालेगाँव बम धमाकों से ध्यान हटाने की साजिश तो नहीं, लिहाजा मैं यह कहना चाहता हूँ कि कहीं मालेगाँव के बम धमाके दिल्ली-राजस्थान बम-धमाकों से ध्यान बंटाने के उद्देश्य से जैश इत्यादि के आतंकवादियों ने तो नहीं किए।
कुछ चैनल इन आतंकवादियों को लड़का और भटका हुआ बताते नहीं थक रहे थे, मुझे उनकी बुद्धि पर तरस आता है. जो चैनल भगवा भगवा चिल्ला रहे थे अब क्या हरा-हरा चिल्लायेंगे? एक चैनल पर समाचार-वाचक कह रहा था कि मुंबई ने मुहंतोड़ जवाब दिया है, मुंबई चलने लगी, काश वह शहीद पुलिसवालों और मारे गए लोगों के घर जाकर देखता कि उनका घर कैसा चल रहा है।
जो लोग ऐसी घटनाओं को कायराना हरकत करार देते हैं और धैर्य रखने का उपदेश देते हैं, वह भी आतंकवादियों का हौसला बढाते हैं, कब चुकेगा धैर्य, कितना बड़ा खजाना है धैर्य का हमारे नेताओं के पास। कितनी जानें लेकर धैर्य का अक्षय-कोष समाप्त होगा। और कायराना क्या होता है, पैंसठ, इकहत्तर, कारगिल, कश्मीर में क्या हासिल किया सरकारों ने, सेनाएं जीतती रहीं, नेता जीत को वापस करते रहे। उनसे बात करेंगे जो हमारी छाती पर गोली बरसा रहे हैं। नक्शे में दिखाई देने वाले कश्मीर को या तो हमला कर अपनी सेनाएं तैनात की जाएँ या नक्शे को संशोधित किया जाए, रीढ़-विहीन लोगों की सरकार कम से कम नक्शा तो संशोधित कर ही सकती है।
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