शहीदों तुम्हें आतंकियों की गोली ने नहीं मारा

शहीदों तुम्हें आतंकियों की गोली ने नहीं मारा,
तुम्हें मारा है हमारे नेताओं ने,
जिनके ऊपर जिम्मेदारी थी,
तुम्हारे द्वारा पकडे गये आतंकियों को सजा दिलाने की,
उन्हें फांसी पर लटकाने की,
लेकिन उन्होंने कानून को ही मारा,
शहीदों तुम्हें आतंकियों की गोली ने नहीं मारा,
तुम्हें मारा है तुम्हारे देश के उन अधिकारियों ने,
जिनके ऊपर जिम्मेदारी थी,
तुम्हें अच्छे हथियार और गोला - बारूद मुहैया कराने की,
अच्छे उपकरण दिलाने की,
लेकिन उन्हें दलाली की दलदल ने मारा,
शहीदों तुम्हें आतंकियों की गोली ने नहीं मारा,
तुम्हें मारा है खुफिया के उन अफसरान ने,
जिनके ऊपर जिम्मेदारी थी,
देश के दुश्मनों की गतिविधियों की सूचना पहुंचाने की,
उन्हें चिन्हित कराने की,
लेकिन उन्हें आराम-तलबी ने मारा,
शहीदों तुम्हें आतंकियों की गोली ने नहीं मारा,
तुम्हें मारा है पुलिस के उन निगहबानों ने,
जिनके ऊपर जिम्मेदारी थी,
मुजरिमों को पकडकर सजा दिलाने की,
उनको जेल पहुंचवाने की,
लेकिन उन्होने घूस लेकर कानून को मारा,
शहीदों तुम्हें आतंकियों की गोली ने नहीं मारा,
तुम्हें मारा है उन गद्दीधारियों ने,
जिनके ऊपर जिम्मेदारी थी,
आतंकियों के मददगारों की गिरफ्तारी की पत्रावली पर हस्ताक्षर टिपाने की,
उन्हें ठिकाने लगाने के आदेश दनदनाने की,
लेकिन उन्होंने संविधान को मारा,
शहीदों तुम्हें आतंकियों की गोली ने नहीं मारा,
तुम्हें मारा है हमने,
गद्दार-लोभी-नेताओं को जो चुनते हैं,
बबूल बोकर आम खाने के स्वप्न बुनते हैं,
तुम्हें मारा है हमारे स्वार्थ ने,
हमारे मरे हुये जमीर ने, हमारे निकम्मेपन ने,
जो पिटने के बाद नारे लगाते हैं,
काम पूरा होने तक सर-आंखों पर बिठाते हैं,
मौका निकलने के बाद आंख फिराते हैं,
अपने स्वार्थ के लिये देश को बेच खाते हैं,
इसलिये हम अपने पर शर्मिन्दा हैं,
हम जिन्दा मरे समान हैं और आप जान देकर भी जिन्दा हैं।


लिखना तो बहुत कुछ चाहता था, लेकिन कलम ने चलने से इंकार कर दिया और दिमाग ने सोचने से, मुझे ऐसा लगा जैसे कि मैं भी कोई मंत्री या राजनेता बनता जा रहा हूँ लेकिन फिर भी मानसिक प्रताड़ना के इस दौर में जितना सोच पाया, लिख दिया।

मारे गए सभी जन-सामान्य के परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त कर सकता हूँ, पूरी तरह से महसूस तो वही कर सकते हैं, जिन्होंने अपने परिवारी जन खोये हैं, कुछ आंसू आँख से निकल गए और शहीदों के प्रति ख़ुद-ब-ख़ुद अंतर्मन से नमन करता हूँ। देश के धूर्त नेताओं से कहना चाहता हूँ कि इन्हें देखो जो अपने बच्चों को इसलिए आगे भेजते हैं कि आतंकियों की गोली वे अपने सीने पर ले लें और तुम्हें बचा लें। उन वीर जवानों का जज्बा देखो जो यह जानते हुए कि मौत कब आ जाए पता नहीं, तुम्हारी जानें बचाने को अपनी जान दाँव पर लगा देते हैं लेकिन फिर भी तुम्हें शर्म नहीं आती, धूर्त राजनीतिक व्यक्तियों।

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