द ग्रेट इंडियन ब्लास्ट तमाशा

पहले पुंसत्वहीन लोगों की तरफ़ से :-

आओ वीर आतंकियो आओ
तुम्हारा स्वागत है इस धर्मनिरपेक्ष मुल्क में
हम तैयार हैं तुम्हारे स्वागत को हमारे बच्चे भी,
आओ तुम बम लगाओ हमारी जडें बहुत मजबूत हैं
हिलेंगी नहीं तब भी, जब हमारा अस्तित्व खत्म हो जायेगा,
तब भी कौमी तराने गूंजते रहेंगे चाहे उन्हें सुनने वाला कोई न हो
तुम हमारी पीढियों को तबाह कर सकते हो
क्योंकि तुम अल्प हो हम अपने बच्चों को आगे करते रहेंगे
तुम उनके सीने चाक करते रहना
क्योंकि तुम अल्प हो और
जो चीज बढ जाती है उसे खत्म होना ही होता है
इसलिये तुम बम लगाओ
हम तुम्हें सजा नहीं देंगे, खीर देंगे
खीर खाओ और इन्तजार करो
कि कब एक आई सी ८१४ उडे
और कब तुम्हें शाही मेहमान की तरह छोडा जाये
तुम हमारे उन बच्चों के सीने गोलियों से छलनी कर दो
जिन्हें हमने प्यार से पाला था बडे अरमानों से पोसा था
तुम बम लगा सकते हो हम कोई कार्रवाई नहीं करेंगे
क्योंकि हम वास्तविक धर्म निरपेक्ष हैं
हम इतिहास से भी सबक नहीं लेंगे
क्योंकि हम बहुल हैं, हम निरपेक्ष हैं
आओ तुम स्वतन्त्र हो कहीं भी बम लगाओ
ट्रेन में, पार्क में, पूजा स्थलों में, अदालतों में
लेकिन हम फिर भी चुप रहेंगे
तुम हमें सिरे से खत्म कर सकते हो
हमारी पीढियों को फना कर सकते हो
तुम कुछ भी कर सकते हो
लेकिन हम यूं ही रहेंगे
क्योंकि आत्मा अमर है और हमें अमरत्व से प्रेम है
इसलिये हे वीर आतंकियो हमें अमरत्व प्रदान करो
और फिर अगर सौ पचास रोज भी मर जायें तो क्या है
काफी तो फिर भी बाकी रहेंगे ही
और फिर उनके जाने से कुछ तो भला होगा ही,
जिन्दा रहे तो क्या कर पाये
मरकर एक लाख तो पाये
और फिर सौ पचास वोट ही तो कम हुये
पता नहीं उनमें से कितने सत्तों को मिलते
कितने विरोधियों को क्या पता इनमें कुछ साम्प्रदायिक भी होते
और कडी निन्दा कर तो दी है
सद्भाव बनाने की अपील भी कर दी है
फिर मौत को एक दिन तो आना ही था
शायद तुम्हारे बमों पर ही उनका नाम लिखा था
विधाता को भी यही स्वीकार था
इसलिये क्या फायदा मरे हुओं को रोने का
अपना चेहरा आंसुओं से भिगोने का
और उनमें कौन देश की धडकन था
कौन युवा ह्रदय सम्राट था
किस का बाप सांसद या मन्त्री था
एक का बाप तो सेना में सन्त्री था
एक अनाथ था
एक के घर में तीन ही वोट थे
इनके मरने से कौन सा पहाड टूट गया
कौन सा समझौता टूट गया
लोग तो मरते ही हैं, कुछ बीमारी से
कुछ जरूरत से ज्यादा तीमारदारी से
बेकारी से, बेरोजगारी से
सर्दी से, गरमी से, बाढ से, सूखे से
अकाल से, भूखे से
इनको लेकर क्या रोना
क्यों अपने नयन खोना
यह दुनिया है ही एक माया-भ्रम
इसलिये क्यों कुछ करें हम
बेकार ही में साम्प्रदायिक सद्भाव को ठेस पहुंचायें
हम बहुल हैं, उदारमना हैं, इसलिये सबकुछ चलेगा
हम क्यों अपने बी०पी० को बढाएं
बढाने को तो व्यापार है जिसके लिये हम तैयार हैं
हम सब कुछ बेच सकते हैं
अपने आप कोअपने बाप को
आओ हमें खरीदो तुम्हारा स्वागत है
हमने बेच दिया है अपना आत्म सम्मान
अपना स्वाभिमान, अपना ईमान
अपना धर्म, अपनी नीति
हम बेचने से पहले खुद को तौलते हैं
फिर अपनी कीमत बोलते हैं
जिसमें खाते हैं उसी में छेद करते हैं
जिस पर बैठते हैं उसी को काटते हैं
हम गलतियां दोहराते ही नहीं
उन्हें बहुगुणित भी कर डालते हैं
तुम्हें ऐसे लोग और कहां मिलेंगे
इसलिये आओ तुम्हारा स्वागत है।

रात गला फाड़कर चीखते रिपोर्टरों को देखा, वही मीडिया के लोग जो अभी तक भगवा आतंकवाद, हिंदू आतंकवाद कहते-कहते थकते नहीं थे, अब उनके मुंह पर ताला जड़ गया है। अब इसे हरा आतंकवाद या मुस्लिम आतंकवाद बताने के लिए उनके पास शब्द नहीं हैं। अब आतंकवाद को मजहब से न जोड़ा जाए, संयम रखा जाए, पाँच लाख का मुआवजा, आतंकवादियों को बख्शा नहीं जायेगा, कडाई से निपटेंगे जैसे जुमले उछाले जा रहे हैं। इंडिया टीवी की रिपोर्टर बेशर्मी के साथ यह कहते हुए नहीं थकती कि यह भटके हुए लड़के हैं। साध्वी के मामले में किसी मीडिया वाले ने शायद ही यह कहने का दुस्साहस किया हो। दो-चार मुस्लिम धर्मगुरु टीवी पर बात करते हुए दिखाए जा रहे हैं, जो इस बात पर ज्यादा तवज्जो देने की कोशिश कर रहे हैं कि इस बात की जांच हो कि यह लोग कौन हैं, उनका इशारा यह है कि यह हिन्दुओं का किया धरा भी हो सकता है तथा यह भी कह रहे हैं कि इतनी बड़ी घटना कैसे हो गई, खुफिया और पुलिस क्या कर रहे हैं। यह भी कह रहे हैं कि यह पागल हैं, सिर्री हैं, क्या AK-47 से गोलियां दागने वाला इंसान जो पढ़ा-लिखा है, जो सोच-समझ कर रण-नीति बनाकर निशाना लगा रहा है, सिर्री हो सकता है। हालाँकि कल्बे सादिक साहब ने बड़ी साफगोई से स्पष्ट तथा उचित बात कही। वैसे मैं हिंदू - मुसलमान के नजरिये से इस बात को देखना नहीं चाहता, लेकिन जब बार-बार " अब आतंकवाद को मजहब से न जोड़ा जाए, संयम रखा जाए" जैसी बातें दुहरायी जाती हैं तो मैं यह सोचने पर मजबूर हो जाता हूँ कि अगर मजहब को ध्यान में न रखते हुए ये वारदातें की जाती हैं, तो सार्वजनिक इलाकों में ही क्यों की जातीं हैं। अगर सरकार से यह पूछा जाए कि कितने हिन्दू तथा कितने मुसलमान अभी तक आतंकी वारदातों में मारे गए तो स्थिति स्पष्ट हो जायेगी लेकिन शायद ही सरकार इसका उत्तर देगी।

संप्रग सरकार तथा उनके घटक दल जो रवैया अपनाए हुए हैं, उसके चलते आतंकवादियों का मुकाबला नहीं किया जा सकता। जब तक मुस्लिम वोटों को रिझाने के लिए आतंकवादियों के प्रति नरमी दिखाई जाती रहेगी, आतंकवाद दूर नहीं किया जा सकता। राकापा के लोगों ने विहिप के कार्यालय में पिछले दिनों इसलिए हंगामा किया कि साध्वी का नाम मालेगांव बम-धमाकों के आरोपियों में आया था, क्या सिमी के प्रति इस तरह का नजारा कहीं भी देखने को मिला? क्यों, क्योंकि साध्वी के विरोध से मुस्लिम मत अपनी तरफ़ खींचने का मौका मिलेगा, जबकि सिमी के विरोध से क्या हांसिल होगा?

एक बात जो मेरे दिमाग में और आई वह यह कि कल को कोई नेता यह न कहने लगे कि शहीद हुए ये पुलिस वाले किसी सांसद से मिलने गए थे अपनी ट्रान्सफर-पोस्टिंग के सिलसिले में। यह भी हो सकता है कि कल को इस की न्यायिक जांच कराने की मांग करने लगे। जामिया के कुलपति तथा अर्जुन सिंह यह घोषणा कर दें कि इन लड़कों के लिए कानूनी मदद मुहैया करायी जायेगी। लालू जी तथा पासवान जी भी इसी तरह की कोई मांग उठा दें।पाटिल साहब इन्हें अपना भाई बता दें. मुझे ऐसा लगता है कि मैं भी राजनीति करने लगूं और यह घोषणा कर दूँ कि मैं यहाँ का गृहमंत्री ओसामा-बिन-लादेन को बनाऊंगा तो हो सकता है कि मुझे सभी धर्म-निरपेक्ष लोगों का वोट मिल जाए और मैं प्रधानमंत्री बन जाऊं।

बहरहाल, हर आदमी को अपनी हैसियत के अनुसार अपना बीमा अवश्य कराना चाहिए, जब घर से बाहर निकले तो अपने बुजुर्गों का अभिवादन अवश्य करे, बच्चों को खूब प्यार करे क्योंकि क्या पता कौन से दिन वोट बैंकों के मारे अंधे हुए स्वार्थी राजनीतिज्ञों के कारण कब लाश में तब्दील हो जाए।

सरकारों को यह चाहिए कि हर परिवार को एक क्लेम फॉर्म तथा एक बिना तिथि का चेक दे दे, सांत्वना संदेश हर घर में भिजवा दिया जाए और कड़ी निंदा तथा कठोर कार्रवाई तथा संयम न खोने जैसे उपदेशों की एक प्रति भी दे दी जाए।

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