कहानी एक पुलिस वाले की
पिछली पोस्ट की तरह यह भी एक सच्ची घटना है। देहात क्षेत्र के एक थाने में वाहन चोरी की एक रिपोर्ट दर्ज हुई। वाहन का मालिक एक रसूखदार आदमी था, लिहाजा थानेदार ने तेजी से कार्रवाई करना प्रारम्भ की। मेहनत रंग लाई और करीब दो सौ किलोमीटर दूर वह वाहन पकड़ा गया। जिस व्यक्ति के यहाँ से वह वाहन पकड़ा गया, वह व्यक्ति एक गरीब मैकेनिक था। वह वाहन उसके यहाँ मरम्मत हेतु किसी व्यक्ति ने दिया था। थानेदार साहब ने उस मैकेनिक को पकड़ा, तदुपरांत वाहन चोर को भी पकड़ लिया गया। अब चूँकि चोर पुलिस से बहुत अच्छी तरह से वाकिफ था, उसने तुंरत ही साम-दाम-दंड-भेद का सहारा लिया। उस चोर ने थानेदार साहब से अकेले में कुछ बातें की, थोड़ी देर बाद थानेदार साहब की कलम के प्रताप से वाहन मैकेनिक चोर बन गया, यद्यपि उस इलाके के सभी लोग यह जानते थे कि वह मैकेनिक चोर नहीं था। लेकिन पुलिस के आगे किस का बस चला है जो उनका चलता। उस गरीब मैकेनिक को तीन दिन अवैध रूप से हिरासत में रखा गया, उसे प्रताड़ना दी गई यह कबूल कराने को कि उसी ने वह वाहन चुराया था और उस इलाके में हुई कई अन्य चोरियों में भी उसी का हाथ था। उसने यह गुनाह नहीं कबूले, लेकिन थानेदार साहब के आगे उसकी क्या बिसात। इस दौरान उस की पत्नी ने कुएं में डूबकर आत्महत्या कर ली। अब बवाल हो गया, फिर वही कहानी दोहराई गई, निलंबित कर दिया गया , जांच होगी, कड़ी कार्रवाई होगी - टाइप की घोषणाएं की गयीं।
थोड़े दिनों बाद जांच रिपोर्ट आ गई जिसमें लिखा था कि मृतका उपवास के चलते कमजोर हो गई थी, जो वायु सेवन करने के उद्देश्य से घूमने निकली थी तथा कमजोरी लगने पर कुएं के ऊपर मुंडेर पर बैठ गई और संभवत: चक्कर आने पर कुएं में गिर गई। थानेदार का इसमें कोई दोष प्रतीत नहीं होता है। और फिर थानेदार साहब की बहाली हो गई।
Comments
Post a Comment