सिर्फ एक छोटा सा सवाल

पेट्रोल के दाम पचास डॉलर से भी कम हो गए हैं, जो कि अधिकतम एक सौ पैंतालीस डॉलर तक पहुँच गए थे। पेट्रोलियम पदार्थों के दाम अभी तक क्यों कम नहीं किए गए यह जानते हुए भी कि मंहगाई के कारण भारत की जनता त्राहि त्राहि कर रही है ।
सरकारी पेट्रोलियम कम्पनियाँ कहने को स्वतंत्र हैं, लेकिन पूरी तरह से सरकार पर निर्भर। इस समय दक्षिणपंथी, वामपंथी, सपा, बसपा, कांग्रेस, भाजपा इत्यादि सभी राजनैतिक दल इस मुद्दे पर कोई भी प्रतिक्रिया देते हुए नहीं दिखाई देते। इससे क्या यह स्पष्ट नहीं होता कि सभी मौसेरे भाई हैं, एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं, कोई नागनाथ है तो कोई सांपनाथ, हाथी के दांत खाने के और हैं , दिखाने के और । प्रदेशों की सरकारों को यह लाभ है कि जब पेट्रोलियम के दाम बढ़ते हैं तो उसके ऊपर लगा हुआ विक्रयकर अपने आप बढ़ जाता है। जब कभी भी पेट्रोल-डीजल का दाम दो-तीन रुपये प्रति लीटर बढ़ता है तो माल-भाड़ा और किराया सम-अनुपात में न बढ़कर अच्छी-खासी मात्रा में बढ़ जाता है, जिससे ट्रांसपोर्टर तो फायदे में रहता है, लेकिन नतीजा भुगतती है गरीब जनता और ईमानदारी से टैक्स देने वाला आम आदमी, जिसे बाजार से खरीदी जाने वाली हर चीज महंगी होकर मिलती है।
पता नहीं आज कहाँ है आम आदमी के साथ वाला हाथ।

Comments