तीन खबरें लखनऊ यात्रा के समय की

तीन खबरें जो विगत दिनों मैंने पढ़ीं-पहली ख़बर थी कि श्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी( उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री) ने कहा कि परमाणु करार मुस्लिम विरोधी है, ठीक बात, देश की नीतियाँ अब इन आधारों पर तय हुआ करेंगी कि कौन सी चीज मुस्लिम विरोधी है, कौन सी हिन्दू विरोधी वगैरा. यदि करार मुस्लिम विरोधी है तो हिन्दुओं के समर्थन में हो सकता है अत: जो चीज हिन्दुओं के लिए ठीक है वह मुस्लिम विरोधी होगी और यह भी हो सकता है कि जो मुस्लिमों के लिए ठीक हो वह हिन्दू विरोधी हो सकती है. धन्य है इन लोगों की मानसिकता. पता नहीं चुनाव आयोग इन बयानों को साम्प्रदायिकता वादी और द्वेष पूर्ण क्यों नहीं मानता. क्या भारत कोई धार्मिक देश है, जिसकी नीतियाँ धार्मिक आधार पर तय होंगी. दूसरी ख़बर तीन अक्टूबर के दैनिक जागरण के पृष्ट संख्या-२ पर था कि उत्तर प्रदेश के बरेली शहर में "यूनियन नेताओं को मुस्लिम कर्मचारियों ने घेरा" , हो सकता है टाइटल में कुछ गलती हो, लेकिन इस ख़बर का लब्बो-लुआब यह था कि रेलवे वर्कशॉप में एक अक्टूबर को ईद की छुट्टी होना थी, किंतु शाही इमाम के फैसले के अनुसार यह छुट्टी दो अक्टूबर को हो गई जोकि महात्मा गाँधी का जन्म दिन होने के कारण भी अवकाश का दिन था, अत: ईद की छुट्टी अवकाश वाले दिन पड़ जाने के कारण चार अक्टूबर को छट की छुट्टी घोषित कर दी गई, इस बात को लेकर मुस्लिम कर्मचारियों ने हंगामा कर दिया और वे तब ही माने जब तीन अक्टूबर को ईद की छुट्टी घोषित कर दी गई, यदि एक पर्व अवकाश के दिन पड़ जाता है तो क्या उसके बदले अगले दिन छुट्टी घोषित की जाती है, कदापि नहीं, लेकिन यहाँ की गई, क्या यह धार्मिक आधार पर की गई ब्लैक-मेलिंग नहीं है, क्या ऐसा ही कार्य अन्य धर्मों के मानने वाले करने लगें तो समाज के सामने कैसा आदर्श खड़ा होगा. और त्यौहार निकलने के बाद जबरदस्ती छुट्टी घोषित कराना क्या यह तालिबानी मानसिकता का प्रतीक नहीं है?तीसरी ख़बर में था कि संजरपुर, आजमगढ़, में लोगों ने काली पट्टी बाँध कर ईद मनाई, वहां के लोगों का कहना था कि पुलिस साजिश के तहत आजमगढ़ के लड़कों को मार रही है और फंसा रही है, लोग नहीं चाहते कि आजमगढ़ के मुस्लिम लड़के आगे बढ़ें. पुलिस की जांच पूरी होने से पहले ही इन लोगों ने अपनी जांच में सबको पाक-साफ़ करार कर दिया. न्यायपालिका का रोल भी ख़ुद ही अदा कर दिया. जो सबूत इन आतंकवादिओं के विरुद्ध मिले उसे हवा में उड़ा दिया. यह सत्य है कि कोई भी अपने प्रियजन के लिए यह कल्पना भी नहीं कर सकता कि उसे सजा हो, कौन अभियुक्त सजा होने के बाद भी अपना दोष स्वीकारता है, लेकिन यही अन्तर है मानसिकता का, यह वह मानसिकता है जो सत्य की तरफ़ से आँखे मूँद रही है, दुःख यह है कि भारतीय राजनीति के दिग्गज सबकुछ जानते हुए भी इस सब को बढ़ावा दे रहे हैं, क्योंकि स्वार्थ की पट्टी बंधे होने पर गद्दी के अलावा कुछ और दिखाई ही नही देता. पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायाधीश की टिप्पणी सही ही लगती है कि इस देश को भगवान भी नहीं बचा सकता.

Comments

  1. जब सरकार में सिमी के सहयोगियों का हाथ इनके साथ हो तो ये क्यों न जोर से बोलें. अर्जुन, रामविलास, लालू, मुलायम और वामपंथी सब इनके साथ हैं, तो इनकी आवाज बुलंद होगी ही.

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  2. श्रीमान आपका मेरे ब्लॉग पर पधारना मेरा सौभाग्य है और उस पर कुछ पसंद आ जाना आपका सौभाग्य है
    हमारे इस सौभाग्य के सिलसिले को कायम रखे दर्शन देते रहे
    आपका सार्थक आलेख पढा अच्छा लगा यह मेरा सौभाग्य है

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  3. एक शब्द में कहूं तो 'सटीक'!
    इसी तरह की बातों की वजह से मुस्लिम समाज पर आतंकवादियों को समर्थन देने का आरोप लगता है। जिस दिन दिल्ली में मोहन चंद शर्मा जी kee शव यात्रा निकल रही थी, उस दिन दिल्ली में 'जामिया नगर' में तनाव फैला था। क्यूँ मुस्लिम नेता शर्मा जी को श्रद्धांजलि देने नहीं पहुंचे? बम फटेगा तो सब मरेंगे, क्या हिंदू क्या मुस्लिम पर फ़िर भी!
    लेकिन जिम्मेदार तो नेता ही हैं इस देश के जिनके लिए सत्ता से बढ़कर कुछ नहीं। ज़बरदस्त लेख के लिए बधाई!

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