यूँ ही कुछ लिख दिया है सड़क के विषय में.

सड़क पर सभी लोग निकलते हैं, मैं भी निकलता हूँ, लेकिन कुछ चीजें ऐसी होती हैं, जो मुझे बहुत खिन्न कर देती हैं और परेशान भी करती हैं. हर छोटे शहर की भांति मेरे शहर में भी बड़े चौराहों पर पुलिस वाले खड़े होते हैं, (बाकी जगहों पर भी खड़े होते हैं, लेकिन वसूली के लिए), इन चौराहों पर अक्सर देखा जाता है कि यातायात पुलिस का सिपाही कहीं एक ओर खड़ा रहता है और जैसे ही पुलिस की गाड़ी दिखाई देती है , तुंरत लोगों के डंडे लगाने लगता है, भीड़ को तितर-बितर करने के लिए. कई जगह ट्रैफिक को वन-वे भी कर दिया गया है, लेकिन सत्ताधारी दल का झंडा लगी हुयी गाडियाँ इस वन-वे में से गुजर जाती हैं. अधिकारियों की गाड़ियों के लिए भी वन-वे का कोई मतलब नहीं होता, और पुलिस वाले तो सब कानूनों से ऊपर होते ही हैं, किस की मजाल कि उनकी गाड़ी को रोक सके. वैसे अगर आपको स्मृति कमजोर न हो तो आपको मुंबई के एक ट्रैफिक हवलदार की याद होगी जिसने एक आई पी एस अधिकारी की गाड़ी को इसलिए रोक लिया था कि वह मोबाइल पर बात करते हुए गाड़ी चला रहे थे, इस पर उन महोदय ने उस हवलदार से डीसीपी का नाम पूछा, उसने बिना कोई परवाह किए अपना फर्ज निभाया , इस का इनाम उसे क्या मिला जानते हैं, इस अधिकारी ने उस हवलदार को अपने पास बुलाया और तब तक खड़ा रखा जब तक कि वह बेहोश होकर गिर नहीं गया। ऐसा ही एक वाकया यहाँ भी हो चुका है, एक विधायक के लड़के ने चौराहे पर तैनात एक होमगार्ड की उंगली इसलिए तोड़ दी कि उसने रेड लाईट पर रुकने के लिए कह दिया था। इन सब बातों से सबक लेकर यह सिपाही भी ज्यादा टेंशन नहीं लेते। जो चल रहा है, जैसे चल रहा है, चलने दो। आज सुबह इसी चौराहे पर पुलिस की एक जीप आ रही थी, चौराहे पर थोड़ा भीड़ थी, हमेशा की तरह, लेकिन अन्दर थानेदार साहब बैठे थे, अब थानेदार की जीप हो और चौराहे पर रुक जाए, ऐसा कैसे हो सकता है, थानेदार साहब ने डंडा लिया और तीन-चार लोगों के जमा दिया, लोग भी बेचारे क्या करते, संविधान में जो गारंटी दी गई है प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा बनाये रखने की, उस गरिमा पर पड़ी डंडे की चोट को सहलाते हुए आगे चल दिए, मुझे ऐसा लगा कि यह डंडा मेरी पीठ पर पड़ा है, डॉक्टर अम्बेडकर की पीठ पर पड़ा है, हर उस व्यक्ति की पीठ पर पड़ा है जो क़ानून में, भारतीय संविधान में विश्वास रखता है, यह डंडा उन माननीयों की पीठ पर पड़ा है जिनके कन्धों पर इस देश को चलने का दायित्व है, यह डंडा पड़ा है भारतीय संविधान और कानूनों पर। बाकी अभी कई चीजें शेष हैं, जिनमें एक है घर के आगे जगह घेरने का सिलसिला, पॉश इलाकों में लोग घर के आगे पड़ी खाली जमीन पर लॉन बना लेते हैं, उसके चारों तरफ़ लोहे का जंगला लगवा देते है, तथा कई बार जनरेटर रखने के लिए पक्का निर्माण करा लेते हैं। न केवल पॉश इलाकों में, बल्कि लगभग हर जगह लोग घरों के आगे की खाली जगह पर कुछ ने कुछ लगाकर या बनाकर जगह घेर लेते हैं। व्यापारियों ने यह बुरा हाल कर रखा है कि नालियों पर स्लैब डालकर फुटपाथ तक की जगह घेर ली है, उसके आगे अपनी दुकान सजा लेते हैं। कुछ साल पहले तक एक सड़क के किनारे लकड़ी के दो चार कारोबारियों ने थोडी जगह घेर रखी थी, फिर पड़ोस में एक मस्जिद का दरवाजा थोड़ा सा आगे बढ़ाया गया (मन्दिर भी ऐसा कर लेते हैं), उसके बराबर में कई घर थे, उन लोगों ने एक-एक कमरे भर की जगह घेर कर कमरा बना लिया। सड़क के दूसरी तरफ कबाडियों ने जगह घेरना शुरू की, अब चौराहे से थाने तक कम से कम पन्द्रह कबाड़ी सड़क पर कब्जा जमाये हुए हैं, इनके सामने की तरफ लगभग दस-बारह ठेले वालों ने राजमार्ग को घेरकर तीस फिट की गली में बदल दिया है, एक - दो बार अतिक्रमण हटाने के लिए अभियान चला, लेकिन अल्पसंख्यक बस्ती होने के कारण ब्रेक लग गया। वैसे प्रभावशाली लोगों का अतिक्रमण हटाया ही नहीं जाता है, ऐसे अभियान भी मुंह देखकर ही चलाये जाते हैं। रोना इस बात का है कि जो आदमी सड़क पर निकलते समय अतिक्रमण को कोसता है, वह अपने घर के आगे ग्रिल लगाकर जगह घेरना अपना परम दायित्व समझता है।

Comments

  1. सीधी सच्ची बात कह दी बिना किसी लाग लपेट के ओर यकीन मानिये ये सब ऐसे ही चलता रहेगा

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  2. एक ईमानदार आदमी की पीड़ा है आपके शब्‍दों में।

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  3. बात बेबाकी से कह दी है आपने भाई,
    नगरपिता हैं पर अंधे उन्हें क्या दिखता है...

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  4. अल्पसंख्यक होने के बड़े फायदे हैं ..........

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  5. वाकई कामन मैन हैं आप । आम आदमी की आम मुश्किलों को कितनी सादगी से बयान कर दिया आपने ।सलाम आपको।

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  6. वीनस केशरीOctober 2, 2008 at 1:29 PM

    जिस सिधाई से आपने बात कही अच्छा लगा मगर आप भी इस देश के नागरिक हो आपको क्या लगता है इन सब से बचने का क्या उपाय है ख़ुद से पूछिए जवाब मिले तो हमको भी बताइयेगा

    वीनस केसरी

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