समस्या पूर्ति

समस्या पूर्ति हिन्दी साहित्य की पुरानी विधा है, इसका प्रयोग मैं इसलिए करना चाहता हूँ क्योंकि मैंने कई बार लोगों को यह कहते सुना है और कई बार ख़ुद भी कह देता हूँ कि-"क्यों खून पी रहे हो या लोग तो आजकल खून पीने लगे हैं", इस पर एक वाक्य मेरे दिमाग में आया ----" आदमी का खून देखो पी रहा है आदमी" , कुछ और लाइनें भी लिखीं, लेकिन मुझे संतुष्टि नहीं हुई। अत: यह लाइनें मैं समस्या पूर्ति के रूप में विज्ञ ब्लोगरों के सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ। आशा करता हूँ कि आप लोग इस पंक्ति को अपनी सुंदर रचना में स्थान देंगे।

Comments

  1. आदमी का खून देखो पी रहा है आदमी

    ................

    कुछ लेते क्‍यों नहीं,हो न जाए बदहजमी

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  2. आदमी का खून देखो पी रहा है आदमी
    हूँ बड़ा हैरान फ़िर भी जी रहा है आदमी

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  3. मजाक के लि‍ए माफी।
    वैसे नीरज जी ने जो सुझाया है, उससे बढि‍या पूर्ति‍ हो पाना मुश्‍कि‍ल है।

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  4. आदमी का खून देखो पी रहा है आदमी
    कितने मुखोटे लगा के जी रहा है आदमी

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  5. आदमी का खून देखो पी रहा है आदमी
    हर रोज दानव बन रहा है आदमी

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  6. Hi, have tried to give few of my words to complete your statement, hope you will like it.



    आदमी का खून देखो पी रहा है आदमी
    और कितना बेशरम होके जी रहा है आदमी,
    एक आंसू की भी अब कीमत नही रह गयी,
    सो सो आंसू खून के बस जी रहा है आदमी
    प्यार दोस्ती भाई चारा नाम को है रह गया
    अब तो सीने मे भी खंजर चुभो रहा है आदमी
    अब न कोई दोस्त और दुश्मन की पहचान रह गयी,
    साया बन के दुश्मनी का साथ चल रहा है आदमी,
    एक पल के ना सुकून न चैन को तलाशता ,
    घूरती आँखों मे बस नफरत ढ़ो रहा है आदमी
    किस कदर बेरहम , वेह्शी, दरिन्दा हो गया..
    आदमी का खून देखो पी रहा है आदमी
    Regards

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